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VOL. 3, ISSUE 1 (2021)
भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन में ‘संगीत’ का योगदान
Authors
डा. शम्पा चौधरी
Abstract
मनुष्य स्वभाव से ही आध्यात्म की ओर प्रेरित एवं उन्मुख है। प्रत्येक शरीर में परमात्मा अर्थात् परब्रह्म का अंश विद्यमान है। यही कारण है कि जब मनुष्य को सर्वोच्च ज्ञान या आत्मा का ज्ञान होता है तो वह सांसारिक राग-द्वैष से मुक्त होकर एवं ऊपर उठकर अन्तर्मन में सत्य के करीब आता है तथा उसे दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है। अध्यात्म में ही ज्ञान, कर्म और उपासना का विशेष स्थान है। इसलिए आध्यात्मिकता का मूल आधार एकाग्रता को माना गया है। एकाग्रता के होते ही आत्मा में अतीन्द्रिय सुख का संचार होने लगता है। संगीत, संगीत के स्वरों एवं संगीत के अभ्यास में एक अद्भुत शक्ति है। संगीत के स्वर मन को एकाग्र करके इतना अधिक तल्लीन, तन्मय और स्थिर कर देते हैं कि स्वर साधना करने से ही संगीतकार की एकाग्रता बन जाती है तथा संगीतकार के लिए आध्यात्मिकता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संगीत सर्वोच्च कला है। भारतीय संगीत की आधारभूमि भौतिक विलास नहीं बल्कि धार्मिक अनुभूति रही है। संगीत का ध्येय धर्म प्रचार नहीं रहा है वरन इसके माध्यम से मनुष्य उस परब्रह्म की परमसत्ता में अंतर्लीन होकर परमानंद की अनुभूति करने में सक्षम होता है। योगशिखोपनिषद् के अनुसार संगीत को श्रेष्ठतम पूजा माना गया है एवं गान को ईश्वर स्तुति का सर्वोत्तम साधन। ग्रीक विद्वान पायथागोरस के अनुसार विश्व के अणु-रेणु में संगीत परिव्याप्त है। महान दार्शनिक प्लेटो के अनुसार समस्त विज्ञानों का मूलाधार संगीत है। विथोवेन ने कहा है कि “Music is the mediator between the spiritual and the sensual Life" प्रस्तुत शोध पत्र में भारत के विभिन्न ज्ञान परंपराओं में निहित संगीत एवं उसमें व्याप्त आध्यात्मिकता द्वारा मानव मानसिक संकीर्णता को दूर कर ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होता है, इसपर प्रकाश डाला गया है।
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Pages:30-31
How to cite this article:
डा. शम्पा चौधरी "भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन में ‘संगीत’ का योगदान". International Journal of Educational Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2021, Pages 30-31
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