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VOL. 2, ISSUE 2 (2020)
भारतीय समाज में धार्मिक व्यवस्था एवं अंतर पीढी संघर्ष
Authors
डाॅ. सुमन कुमारी
Abstract
भारतीय समाज धर्म-प्रधान समाज कहलाता रहा है और यहाँ धर्म को प्रत्येक क्षेत्र में महत्ता प्राप्त रही है। धर्म व्यक्ति, परिवार, समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के जीवन को अगणित रूपों में प्रभावित करता रहा है। यहाँ भौतिक सुख प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य नहीं मानकर धर्म संचय को प्रधानता दी गयी है। धर्म की धारणा के अन्तर्गत हिन्दू उन सब अनुष्ठानों और गतिविधियों को करता है, जो मानवीय जीवन को गढ़ती और बनाये रखती है। धर्म हिन्दुओं के जीवन को जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक रूपों में प्रभावित करता रहा है। परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था धर्म पर आधारित है। जब किसी युवा के वास्तविक-अहम् और आदर्शीकृत- अहम् के बीच अन्तर पड़ जाता है अर्थात् जब उसकी वास्तविक स्थिति उन ऊँची स्थितियों से भिन्न होती है, जहाँ तक पहुँचने की आकांक्षा रखने को वह किसी-न-किसी कारण से अभिप्रेरित होता है और जब दोनों स्थितियों के मध्य असंगति होती है तो वह संघर्ष की स्थिति होती है। युवा वर्ग वैज्ञानिक सोच के आधार पर पुरानी परंपराओं में परिवर्तन चाहते हैं जबकि बुजुर्ग वर्ग पुरानी परंपराओं को ही ढोना चाहते हैं। यहाँ यभी कहा जा सकता है कि इसमें अहं की टकराहट भी होती है।
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Pages:17-21
How to cite this article:
डाॅ. सुमन कुमारी "भारतीय समाज में धार्मिक व्यवस्था एवं अंतर पीढी संघर्ष". International Journal of Educational Research and Development, Vol 2, Issue 2, 2020, Pages 17-21
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